Tuesday, 5 January 2016

जिन्दगी का फलसफा

नादान दिल कटे पंख के बावजूद उड़ना चाहे,
वक्त रेह-रेह के वजूद का एहसास दिलाए |
सब कहे गुजरा कल भूल आगे चलो,
फिर खुद ही जख्म के घाव खुरेदे वो |
चाहूँ न कि पुराना कुछ याद आऐ,
पर ये दुनिया भुलाते हुए भी याद कराऐ |
क्युँ न जिन्दगी आती एक हिसाब के किताब के साथ,
न होता कोई शिकवा न गिला न होती कोई गलत बात |
जिन्दगी का फलसफा है जाने कितना कठिन,
इसे समझना क्या कभी होगा मुमकिन |
न जाने कैसे थे वे ऋषि-मुनी जीवन चक्र इतनी आसानी से भूझ लेते थे,
बिना किसी परेशानी के जी कर फिर मोक्ष को हर लेते थे |
कभी लगता बड़ा आसान है एक खुली किताब की तरह,
कभी उसी किताब के पन्नो में खो जाऊ भूलभुलईयी की तरह |
जाने मेरे जीवन में वो पल कब आऐगा,
जब जिन्दगी का यह फलसफा मुझे समझ आऐगा |
दो पल ही सही, चक्का चला कर सही जिन्दगी का, उसे पूरा कर लूगी मैं,
जाने कब वो किनारा छू सकूगी मैं |

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